[Advaita-l] Hiranyagarbha is the ultimate Saguna Brahman and all Saguna lokas are varied manifestions of Hiranyagarbha-loka

V Subrahmanian v.subrahmanian at gmail.com
Tue May 30 07:35:24 EDT 2023


Shri Natraj Maneshinde's post in FB:

https://www.facebook.com/natraj.maneshinde/posts/pfbid02XGVZCVRUcwPDBvu77Dz4Rv691dEU13N9PeXe3AhcrucdcDH69JNrguEgthodN1sVl

Swami Akhandananda Saraswati ji Maharaj, one among the greatest Advaitin
Acharyas and an Ananya Krishna bhakta, briefly explains the concept of
Hiranyagarbha in his Bhagavata pravachana. One can listen to the entire
pravachana here :
https://youtu.be/Nvgu0YsVZHI
<https://youtu.be/Nvgu0YsVZHI?fbclid=IwAR1qLNF_USeA-wydGRhlKd4MNV0D5hJjdVfsGx3ctljsfupIiDLcd5abWsE>
( Many thanks to Shivam Goel
<https://www.facebook.com/profile.php?id=100012477408369&__cft__[0]=AZUrY9FY8lcuYqO7qX0uS1faDKyA7YKRChacNhjFD001IN1VzVFnmGBlc37jqU2MscNwHiA9mKjH-xGAErouemt1yajAviLzWAL_gPoRigyZ25-XI-qbYFeW57brutuNCFs&__tn__=-]K-R>
bhai for sharing this video [image: 🙏🏻])
Below are a few snippets from Maharaj ji’s lecture. Here, Maharaj ji
clarifies the Advaitic position on Saguna Brahman and Saguna lokas.
Maharaj ji says that it is the one Hiranyagarbha who manifests as Vishnu,
Shiva, Devi, Krishna, Rama etc and it is the one loka of Hiranyagarbha
which appears variedly as Brahma loka, Shiva loka, Vishnu loka, Devi loka
etc, based on the bhava of the Upasaka.
“आप शिव से प्रेम कीजिए, विष्णु से प्रेम कीजिए, राम से प्रेम कीजिए, कृष्ण से
प्रेम कीजिए, देवी से प्रेम कीजिए। अरे ! ये तो एक ही चीज़ है भाई! उसमे
पांचभौतिक कुछ नहीं है। आपका यह तैजस हिरण्यगर्भ में रम रहा है। वहाँ आनंद की
तरंग है, आनंद की बौछार है, आनंद की हवा बहती है। उपासना माने संसार के सुख
दुःख से ऊपर उठकरके , आप आनंद संगीत सुनिए, आनंद स्पर्श का अनुभव कीजिए, आनंद
सौंदर्य को निहारिए, आनंद माधुर्य का आस्वादन कीजिए, आनंद सौरभ को सूँघिये। यह
आनंद लोक है। इसका नाम है गोलोक, इसका नाम है साकेत लोक, इसका नाम है वैकुण्ठ
लोक, इसका नाम है शिवलोक, इसका नाम है देवी लोक। है एक ही। भाव के भेद से अलग
अलग जान पड़ता है। …
गोलोक का अनुभव आप यही कर सकते है। हिरण्यगर्भ के लोक में ही, हिरण्यगर्भ के
आवान्तर भेद है, ब्रह्म लोक के ही आवान्तर भेद है। सृष्टि की प्रधानता से
ब्रह्मलोक, पालन की प्रधानता से वैकुण्ठ लोक, धर्म की प्रधानता से साकेत लोक,
वैराग्य की प्रधानता से शिव लोक और ऐश्वर्य की प्रधानता से शक्ति लोक - ये सभ
हिरण्यगर्भ के ही विस्तार है। आपका भाव हिरण्यगर्भ को उस रूप में दिखा देता
है।"

Om


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